Friday, 2 December 2016

ગઝલ

आंखने  ऐवुं पूछातुं  होय तो
आंसुंनुं सरवर सुकातुं होय तो

पांपणे तोरण टिंगातुं होय तो
उत्सवो जेवुं  मनातुं होय  तो

लूंछता पूर्वे बीजानां अश्रुओ
आपथी थोडुं रडातुं होय तो

छोने मुरझावुं पडे सूर्यास्त पर
सूर्यमुखी जेम खिलातु होय तो

आवतीकाले जवानुं होय त्यां
ऐ स्थले हमणां जवातुं होय तो

कोई हरणुं आम तरस्युं ना रहे
झांझवुं झाली  शकातुं होय तो

हाथमां तारा  हथोडी-टांकणुं
शिल्प मारामां घडातुं होय तो

थोडुं मारामां रहेलुं  दर्द आ
थोडुं तारामां घूंटातुं होय तो

      
कोई मासूम छोकरीना पग महीं
झांझरीमां  रणझणातुं  होय तो

       भरत भट्ट

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