Thursday, 1 December 2016

ગઝલ

करूँ ना याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे;
गज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे;

वो ख़ार-ख़ार है शाख-ए-गुलाब की मानिंद;
मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे;

ये लोग तज़किरे करते हैं अपने प्यारों के;
मैं किससे बात करूँ और कहाँ से लाऊँ उसे;

जो हमसफ़र सरे मंज़िल बिछड़ रहा है फ़राज़;
अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे।
~ Ahmad Faraz

No comments:

Post a Comment