Monday, 26 December 2016

ગઝલ

उल्फतें हैं इतनी तो जताते नहीं क्यों ?
बस एकबार कह दो के आते नहीं क्यों ?

माना हम ठहरे नासमझ ही सही ,
समजदार हो तुम समझाते नहीं क्यों ?

आँखों में आँसु और दिल में तड़प है
तुम रूठे दिलों को मनाते नहीं क्यों ?

शिकायत थी पहले सताते बहोत हो
है अब ये शिकायत सताते नहीं क्यों ?

गर जिंदगी से मेरी जा ही चुके हो
तो यादो से बतलादो जाते नहीं क्यों ?

परेशां है 'शबनम' इन खामोशियों से,
है राज़ -ए-दिल क्या बताते नहीं क्यों ?

~शबनम

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