कांई कहेवानुं नथी के कांई लखवानुं नथी
सीधी केैं तीरछी नजरथी कैं निरखवानुं नथी
झाड छे तो झाड पर पंखी वसे,टहुके अने
नीड बांधे के ऊडे ऐमां हरखवानुं नथी
आ अरीसो छे नजाकत के रुआबोनी झलक
तुं तने खुदने परख तो कैं परखवानुं नथी
शब्द तो साधु पुरुषनी साध या ने साह्यबी
तप्त ना थाशो धूणीनी जेम धखवानुं नथी
आपणुं आ दिल,बहु नाजुक नमणी चीज छे
आपणे कोईना दिलने पण भरखवानुं नथी
भरत भट्ट
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