Tuesday, 11 April 2017

ગઝલ

सतत टीपा सतावता मने अने तने
नदी बनी वहावता मने अने तने

जगा, समय, परिस्थिति त्रणेय थै जुदा
अलग अलग विचारता मने अने तने

हशे ए कोण ?  जे रूठे अने वली तरत-
घडी घडी मनावता मने अने तने

छलक छलक थता हता जे द्रश्य बे वच्चे
निचोवीने नीतारता मने अने तने

नजीक जेम हुं अने तुं आवता हता
जता हता गुमावता मने अने तने
                  ---धर्मेश उनागर

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