Wednesday, 28 June 2017

ગઝલ

बैठा हूँ इंतज़ार में पर उम्मीद मेरी बर नही आती
परस्तिश को रूका आखिरी, सनम की ख़बर नही आती

फ़त्वा मोहब्बत का  सुनाती रही जो ता उम्र मुझे
निगाहों के मयखाने में कभी  फ़ुर्सत से नज़र नही आती

क़ातिल वो  क़ानून वो  क़ायदा वो  क़ाज़ी भी वो
रात मेरी कज़ा सही, रात वो  मिलन की भर नही आती

गुमशुदा सी तारीख़ बन बिखरता गया मैं पन्नों में
जश्न-ए-नमाज़ मैं,  जायज़  अज़ान वो,  पर नही आती

जुस्तजू से जहन्नुम तक 'उदयन' जाहिल गुज़रा
एहतियाज पर  मेरे  एहसान  उसका,  मगर नही आती

- उदयन

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