Friday, 14 July 2017

અછાંદસ

अनुभूति  !

आज  सबेरे  मैंने
घर की  सारी  खिड़कियाँ  खोल दीं। 
नीलगगन  से बरसती 
वर्षा  की रिमझिम  बूँदों  को
आने  दिया  कमरे में।
मेरे  समग्र  अस्तित्व  को
पानी  की  फुहार  से  पावन  किया।
वृक्ष  पर्णों  की  मधुर  ध्वनि को
पकड़ा  अपने  कानों  से।
खुद  को  कुलबुलाया
बादलों  की  घटाओं  से।
कलकल  बहते  जल का
अभिषेक  किया  आँखों की  पलकों  पर
निसर्ग के निमंत्रण  को  किया  स्वीकार
मेरे भीतर  उठी एक पुकार
'मैं  जिंदा  हूँ। ...मैं  जिंदा  हूँ ...!'
                  ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '

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