Tuesday, 10 October 2017

ગઝલ

बडी  तेज ठंडी हवायें चले,
गरजती गाजती घटाये चले।

अंधेरे  घने छा गये हैं रात के,
डरी खोफ खाती बलाये चले।

सुने पन को भारी बनाती हुइ,
बडी ही भयानक सदाये चले।

कीसीकोनहीं डर कीसी बातका
खुले आम  सारी खताये चले ।

अकीदे का भारी तकाजा रहा,
भरोसे की मारी जफाये चले ।

बड़ा सरचढाहै खीरद का नशा
यहां कोन किसके चलाये चले।

बढा आज मासूम खुदीका चलन,
सभी  राह अपनी बनाये चले ।

                     मासूम मोडासवी

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