Wednesday, 28 September 2016

ગઝલ

गझल
मननी भीते जात तारी खोडमां;
होय कामण गारी ईच्छा दोडमां.

रोज पीछो हुं-ज-तो मारो करु,
ने दगो दै जाउ मोडेमोडमां.

गीत गझलो कागळे लखतो रह्यो,
जिन्दगी जीती जवानी होडमां.

हाथ खुल्ला थै गया छे अंतमां,
कैं क ने कंई पामवाना कोडमां!

कोण उतारे "नफस"ना थाकने;
आप छो हर रोज दोडा दोडमां!

_//नरेन्द्र मकवाणा "नफस"

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