रोज सांजे आ कलम पूछ्या करे
कोण परखे आ कलमना दु:खने
बिपीन परमार
आज अंधारुं चड्युं छे, झाड पर
रात संगाथे लड्युं छ, झाड पर
मनिषा प्रजापति
फूलमां बेस्यां हसीने तो थयुं
झाडवा लाग्या बधाए डोलवा
सोनल झापडा
माणसो सारा नथी आजे बधा
एक बे एमांथी थोडां नेक छे
जागृति परमार
आजना आकाशमां अंधार छे
केटलो सुदर हवे पडकार छे
धारा सीवलिया
हींचको तारो थयो खाली हवे
ए जगाडे रोज तारी झंखना
शहेनाज कपडवंजी
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