Friday, 25 November 2016

ગઝલ

नगरमां कोई सांभलतुं नथी ऐवुं कबुलो छो
तमे मूंगा नगरमां तोय कोनुं  नाम पूछो छो

तमारी आ तरफ डूमो अने पेली तरफ उत्सव
अने ऐ बेउनी वच्चे तमे तमने  वलूरो  छो

तमे सांकलमां अटवाया करो छूटवानी ईच्छाथी
तमे सांकल बनावो छो ने  सांकलनो  नमूनो छो

अने रस्ता वचाले रोज कोनी राह जुओ  छो
हजी,कोनी प्रतीक्षामां तमे नखशिख झूरो छो

युगोनो काट लाग्यो छे तमे तूटी नथी शकतां
तमे अकबंध  संदूकनो  घणो  जूनो  नकूचो छो

                    भरत भट्ट

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