पथ्थरोनी पार नीकलती रही
ऐ नदीनी जेम खलखलती रही
झांखीपांखी ज्योत झलहलती रही
मीणबत्ती रातभर बलती रही
श्वासना सापोलिया विंझाय छे
ऐक समली तोय टलवलती रही
बोबडी ऊभी रही संवेदना
पंखीओनी चीस सांभलती रही
दिवसो ठंडा निसासा जेम ने-
स्वप्न साथे रात पीगलती रही
......भरत भट्ट
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