Monday, 28 November 2016

ગઝલ

जिवन छे  फूल माफक, हुं पण खरी जवानो,
जोइने पानखर आ, हुं क्यां डरी जवानो

फूलो महेकसे जो,तननी उपर चढीने
आपी शयन हुं  तननुं,  त्यारे मरी जवानो

डूबुं भले हुं नाना, खाबोचियामां उतरी,
हिम्मत करीने भेगी,सागर तरी जवानो.

यादोथी खोतरीने, सहेतो रहुं दरद आ,
लइने मलम समय शुं, जख्मो भरी जवानो ?

आ काव्य आ गजल बस, मिलकत  छे एज मारी,
सर्जक बधुं लखीने, नामे करी जवानो.

-  सर्जक वडोदरीया

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