Tuesday, 20 December 2016

ગઝલ

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मानवना हस्ते जंगलो वधता गया घटता गया
ज्या क्रमशः संसार उजडता गया वसता गया
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अंजान छे आ मानवी जेनी व्यथाथी आज पण,
बाळक थइ क्यारेक ए हसता गया रडता गया
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ज्यारे मळ्यो ना कोइ पण कांठो जेने मजधारनो,
संगाथ लहेरे स्वार्थमां डूबता गया तरता गया.
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कागळ लखी राख्या हता, जे पानखरनी ऋतुना,
सरनामुं खुदनुं शोधवा खरता गया उडता गया.
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उभो दीवाडांडी समो सर्जक अडीखम त्यां हजी,
मार्गे भटकता ए बधा, मळता गया खसता गया
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-गौतम परमार  "सर्जक"

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