Sunday, 15 January 2017

ગઝલ

दफतर  उपाडवाथी  फकत ऐ रमत रही
शीखी शकायुं  कांई नही  आवडत  रही

आनंदनी कथा  हुं  विगतवार  कही  गयो
दुःखना दिवसनी कोई न वाते  विगत रही

आ टेरवाने  स्पर्शनी  भाषा न आवडी
ने आंगलीओ केम हजी जडभरत रही

कारण विना हुं केम छुं तारा विचारमां
मारी उदास आंखने जाग्यानी लत रही

आपेल तें जे घाव हुं पंपालतो रह्यो
मनने आ केवी  पीडानी ममत रही

                   भरत भट्ट

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