दफतर उपाडवाथी फकत ऐ रमत रही
शीखी शकायुं कांई नही आवडत रही
आनंदनी कथा हुं विगतवार कही गयो
दुःखना दिवसनी कोई न वाते विगत रही
आ टेरवाने स्पर्शनी भाषा न आवडी
ने आंगलीओ केम हजी जडभरत रही
कारण विना हुं केम छुं तारा विचारमां
मारी उदास आंखने जाग्यानी लत रही
आपेल तें जे घाव हुं पंपालतो रह्यो
मनने आ केवी पीडानी ममत रही
भरत भट्ट
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