Monday, 8 May 2017

ગઝલ

तीरो तरकश के  दहाने पर रहे,
उनके हम सीधे निशाने पर रहे ।

वस्लका वाअदा न पुरा कर सके
वो मगर  फीरभी  बहाने पर रहे ।

दास्तां सब अहेले वफाने जानली
तजकीरे  अपने  फसाने  पर रहे ।

कितनी  तल्खी से हमें देखा कीये
ओर  हम  खुदको  बचाने पर रहे ।

बिखरी उनसे मिलनेकीसारीउमिद
होसला हम दिलका बढ़ाने पर रहे ।

इस तरह बिखरे सजाये ख्वाब सब
घर नया हम अपना सजाने पर रहे ।

हम भी मासूम क्या बताते  माजरा
रंज  हम सब  तनहा उठाने पर रहे ।

                   मासूम मोडासवी

No comments:

Post a Comment