तुम भी करीब थे हम भी करीब थे,
फीरभी जुदा जुदा अपने नसीब थे।
मिलते रहे हमें ये लम्हे विसाल के,
महेकी हुइ फजाके के मौके अजीब थे।
चलता रहा जहां में आसां सफर हमारा,
कितने नजर के सामने जल्वे नसीब थे।
छाइ रही निगाहों मे रोनक बहार की,
नजरें लुभाने वाले मंजर अजीब थे।
सोचो मे ढल रहाथा हालात का नजरीया,
खाके नये नसब के लीखते अदीब थे।
सो बार नाम उनका आया जबां पे हरदम,
आलम में वोही अपने दिलके करीब थे।
जीस दरपे जाके अपना सर ये जुका है मासूम,
उस आस्तां मे बसते मेरे हबीब थे।
मासूम मोडासवी
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