Friday, 1 September 2017

ગઝલ

लाया है घड़ी प्यार की मोसम ये सुहाना,
गुंजे है फजाओ में उल्फत का तराना।

जागी है खयालों में तेरी चाह की हसरत,
है फर्ज तेरा वस्ल के वाअदों को निभाना

मद मस्त सी छाइ है  गुलशन में बहारें,
फुलों की महक पाके सब खुश है जमाना।

दो चार घड़ी तुम भी आ जाओ मेरे हमदम,
बैठा है तके राहको तनहा ये दीवाना।

हर सीम्त तरन्नुम की बजती नइ ताने हैं,
मयखाना बना साकी है सबका ठीकाना।

हर चीज मुहय्या  है तबीयत के बहेलने की,
मासूम चले आओ मोसम है सुहाना ।

                    मासूम मोडासवी

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