तेरी वाह निकले
मेरी आहत निकले।
जो तुम ने जगाइ
वो ही चाहिए निकले
अगर तु जो चाहे
नइ राह निकले
तेरे साथ चलते
सरे राह निकले
हो तेरा करम तो
मेरी चाह निकलेगा
ये कैसे सफर को
चले ख्वाह निकले
बने तृप्त अरमां
तेरा भाव निकले।
तृप्ति त्रिवेदी "तृप्त "
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