Saturday, 4 November 2017

ગઝલ

आखिर तेरी चाहत है दीवार की तरह
चाहत की चाह मे हुए बीमार की तरह।।

कायल बना तेरी दलीलों से हरदम युहीं,
परेंशा कीया तुमने कहके इकरार की तरह।।

जज्बातों का इजहार हुआ अखियों से सदा,
गुल खीलें मुहब्बतों के गुले गुलजार की तराह।।

मांग लिया साथ हमने सदीयों का तकदीर से,
खुशीयाँ बांटते चले सब को यार की तराह।।

वादों का कारवां बनता रहा हर मुलाकात में,
काजल दिवानी भईँ प्यारमें अहंकार की तराह।।

"काजल"
किरण पियुष शाह
२८/१०/१७

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