Saturday, 4 November 2017

અછાંદસ

🌻

उम्र

गुजरा हुवा वक्त
रास्ता ओर भी सख्त
कभी  थी जमीन ?
कभी खुश्बु थी जमीन
कभी हरी तो कभी खीली
उम्र के साथ बदलता
अचानक  हो गया जैसे
बदलाव बडा स्वरुप का
बडा घर बडी सडक
बडा था पेड वहा खडा नरक
सख्त और भी सख्त
ये वक्त ...
आखो से देखा था
अब धुधला नजारा ..!
पक्की सडक के नीचे दबा हुवा
वो खेत ओर बेलो के गलेमे  बधा धंट  का नाद..
रुक जाते थे आज भी पेर उस जगह पर...
जहा..
कोयल दिनभर बोला करती थी
पीपलके पत्तोमे से बोलती चिडिया ओर कौवा !
काके बोलाता हुवा..
मधुर गुंजन करते भवरे गुजर गये...
कतारे लगाती कुंज
कतार मे चलते अनपढ ऊट
ओर कतार मे चलती भेड-बकरीयाँ...
छुपा ली है किसिने..?
ढुढता हु जहा पर
वहा सख्त सलाखोमे से जाकती है अांखे..
गुलाम बनी हुई गाय ओर
तोतेकी सांसे..
हाफते हुए वो गली के कुत्ते
ईधर से उधर पानी की तलास मे....
जहा कभी पनधट हुवा करता था वो कूवा सुंघ रहा है
हाथी आज जुक रहा है
कई माईलो चल कर आई है
सूखी हवा..!
मेरी उम्रका श्वास बनती
जीन्दा रहेनेका जवाब पुछती?
शख्त सडक पर बिछड गई
वो हरियाली मेरी उम्र की थी
गुजर गई!
नई सडके नये मसानधाट पर
अब चिता कहा?
चमत्कार की सैया पर लेटा हुवा...
उम्र का पहलु
कभी दफनाया जाता था
तो कभी..
जलाया जाता था..
सब संस्कारोकी शमा बुज गई चलबसा सबेरा उम्र के साथ...
हाथो-हाथ
मीट्टीकी खुश्बु बीक गई
उम्र ठीक गई

जाग्रुति मारु महुवा "जागु"
ता:-03-11-2017
समय: दोपहर 12:00

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