Saturday, 19 November 2016

ગઝલ

लाश जेवा को'क बळवा नीकळे
ओढवा कफनो त्यां घरडा नीकळे

छे अनोखी मानवी रुपे कबर
जीवता ज्यां फक्त मडदा नीकळे

प्रेमनी आ  खीण छे उंडी घणी
मौन भेदी प्रेम  पडघा नीकळे

जिंदगीमां तो हसाव्यो ना कदी
बेसणामां ते ज रडवा नीकळे

जीत नक्की होय छे ए जंगमां
मात  खुदने दै जे लडवा नीकळे

-गौतम परमार"सर्जक"

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