रूप
अन्जाम देदिया
ईन्तजाम और ये ईल्जाम
रूपिया बदल गया,
इन्सान बहुरूपी...
लकिर की भाती खिचगई
जड पाताल के पानीमे मील गई और कही...
-कहा पर..
हरी-भरी बहार नीकली
नंद-ऩंदिनी
कवल खिल गये
रूप बदल गये
हजारो रात के
दिन बदल के
रूप ये जगह छोड...!!
नये रूपये की वजह
अन्जाम दे गये
सलामत ईलाका
रूपनाम नम
नमो फकीर,
हाल बैफिक्र पर
रस्ता देख-भेख !
नवनीत
रूप जैसा रूपिया
रूपनीत..
बहार पल्लवीत पेड लगा
पत्ते-पत्ते पे
फल...
पकते शैशवका ये रमण
ईतिहास बदलता रूप,
चलण चंचल
चला आखिर
तक
बहेका रूप
शम्भलता हूवा अन्जाम
आखिरी पडावपे
अर्थ बदलता
ऱूपवान रक्त पशिना
बहता हूवा भक्त
नस-नस नशा चडाते जैसे
रूप बदता
रूपिया पी के
लगान भरी
खातिरी रूप राखी बहार
माला जपकी कतार
तपती..
नये पान
चलण लगे रूपवान
विश्व समान
जागृति महुवा "जागु"
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