जान,
रूह थरथराई
कातिल आस-पास और ये
तनहाई ,
पेड के साथ बाते करते-करते
चिल्लाई एक चीख,
कांपति
तलास जैसे कोई जान...
अधोरी ??
पत्ते-पत्ते गीनता कब्रस्तान
गड्डेमे
तबाही ..
हलचल...
खौफनाख करवटे
ले चूकी,
ये दिवानी दफन जैसे मौमकी भाती
जल रही,पीधल रही
रक्त-रिक्त आंसुओके
रूदन...को सूनसान काईनात
पलटती
जान,
आखिर मे लौटी कब्रस्तान जैसे
वो आएगा मेरी जान
एक पत्ता
देखे,
जड जलता
जिवन काल
रूह बनके तल्लाश
रात का आना और
ये जान...
भटकती पेदल पाव
दिन का पेड,
पत्ता-पत्ता..
गीने
शाम तक?
कोई निकले ओर बेजान..
ऐकान्त-तन्हा
रूप
जाऩपहेचान
जागृति मारू
No comments:
Post a Comment