आईना....
वजह-बेवजह टूटा आईना
करीब से परवाना देखा,
सूईकी नोक जैसे चुंभन
दिलका दस्थकत
देती बार-बार यादे-विवादे
दर्ज पन्ने-पन्नेमे
कई किताब ..
लिखती-पढती..
प्रतिबिम्ब जैसे कई टुकडोसे कटा..
था वो..
आईना ...
देखकर मुजमे सवरता,
कहती कुछ और सम्भलती तकदीर...
चौट हवाकी ?
जमीकी जडतड,
धडकती -तडपती
लावारीस चीख..
कई टूकडोमे
सुनवाई ...
बुनवाई..
मूर्त-अमूर्त रुपवान बनके
लडी थी तुम...
सूखी...
कई टूकडोमे बेहती रेहती..
पार-उसपारभी
दु:खी...
अंबरका प्रतिबिम्ब
समेटती जैसे तुम ही हो
एक आईना
आ-समा मुजमे तेरा सवरना
बरसना...
बहकना...
बादल का बेवजह
गरजना...
आखिर कई टूकडोमे
आई-ना मे ,
तुम..
दास्तान...
बनके परवाना करीबसे गुजरा हुवा
वक्त-बेवक्त..
कई टूकडोकी किताब बना...
एक आईना
जाग्रुति मारु महुवा "जागु"
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