Friday, 23 December 2016

गझल

रातनो छे खुमार आंखोमां
ऊघडे छे सवार  आंखोमां

आंखमां यादनी  ऋतुं  बेसे
वरसे छे धोधमार आंखोमां

घेनमां आंख डूबती त्यारे
स्वप्न छे बेसुमार आंखोमां

कोई यात्रा  करे छे  भीतरमां
कोई मारे छे लटार आंखोमां

साचवेला ऐकाद सपनानां -
थाय टूकडा हजार,आंखोमां

क्यां कदी पण जई शक्युं कोई
तीक्ष्ण थई  आरपार आंखोमां?

शब्द के मौनथी न समजाये
तो  कहेवुं  धरार  आंखोमां

             भरत भट्ट

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