Thursday, 22 December 2016

अछांदस

जीहवा..

मौन सभा थी ?
कुछ केहती भी ,नही भी केहती भी!!
कुछ मतलब से...
बेजुबान बनी,
जीहवा..
हरिचंन्दका स्मरण-सत्य कहीपे तब..
मीलाता है भगवान ...
केवल एक जीहवा के दो वचन थे राम
शब्दका ही सहारा था एक नाम-सचमे चारो धाम
श्रवण जैसे मरा नही...!
केहते गये मात-पिता वही था लोचन
सची जीहवाका श्राप...
दो वचन में माप..
जीहवा से महाभारत था!!
मौन सभाका पितामह और
एक प्रतिग्नामे भिष्म
गंगामैया का संतान पवित्र !!
पाप-पुन्य को जान,
हर युग मे मान ,
सतयुग...
त्रेतायुग..
द्वापरयुग..
क्युं आज है कलीयुग??
जुठ-सचकी मिलावट
बनावट करती मनु-उष -यश
यह नामना
यह कामना
यह सामना
अपनो से-गैरो से भी कुछ जानना..
जीहवा गा रही है त्रिकाल
एक मात्र-बहु मात्र जीहवा का सुकान !
क्या कुछ करती है जीहवा
मीरां की पुकार..
नरसी की मुखार..
ला सकती है जमीपे हरि का अवतार ..
ज्योतिर्लीग जैसे ओमकार
जीहवा से गाता हुवा संसार
फिर क्युं न जाने??
ईस कलयुगका ईन्सान
जीहवाको धडाते-धडाते
सोच रहा है!!
अपनो मे भी झुठको खोज रहा है
अपने आप को बदलता जैसे मौन....
अग्निपुत्री भर सभामे थी कलंकित
पांनचाल उस समय
ईस समय ..
पितामह जैसी
जीहवाका आरंभ-
महाभारत  और कई सभाकी जीहवा का
अंत युग सास्त्र
मंथरा-शकुनी परास्त

जाग्रुति मारु महुवा "जागु"

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