गझल : विजय राज्यगुरु
सौ कहे : 'खस'.आखरे थाके ज ने !
एक बेबस आखरे थाके ज ने !
आटली कांडी घसाई झळहळे !
एक बाकस आखरे थाके ज ने !
जीववानुं क्यां सुधी जीव्या वगर ?
एक माणस आखरे थाके ज ने !
आ वरद मुद्रा ने अगणित मागणी !
एक आरस आखरे थाके ज ने !
जो प्रगट साक्षात ना कैं थाय तो ,
एक तापस आखरे थाके ज ने !
तेल खूटे तो य बुझावे नहीं ,
एक फानस आखरे थाके ज ने !
क्यांय पडकारो नहीं लडनार ना ,
एक साहस आखरे थाके ज ने !
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