Sunday, 11 December 2016

ગઝલ

गझल  :  विजय राज्यगुरु

सौ कहे : 'खस'.आखरे थाके ज ने !
एक  बेबस  आखरे  थाके  ज  ने !

आटली कांडी घसाई झळहळे !
एक बाकस आखरे थाके ज ने !

जीववानुं क्यां सुधी जीव्या वगर ?
एक माणस आखरे थाके ज ने !

आ वरद मुद्रा ने अगणित मागणी !
एक आरस आखरे थाके ज ने !

जो प्रगट साक्षात ना कैं थाय तो ,
एक तापस आखरे थाके ज ने !

तेल  खूटे  तो  य  बुझावे  नहीं ,
एक फानस आखरे थाके ज ने !

क्यांय पडकारो नहीं लडनार ना ,
एक साहस आखरे थाके ज ने !

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