ग़ज़ल
मेरे अज़ीज़ दोस्त ! मैं तेरी ख़ुशी से ख़ुश
जैसी मिली है मुझको मैं उस ज़िंदगी से ख़ुश
ख़ुशियाँ भी और और की होती हैं और और
ये रोशनी से ख़ुश है तो वो चाँदनी से ख़ुश
कोई नदी है ख़ुश कि समुंदर से मिल गई
कोई पहाड़ अपने से बहती नदी से ख़ुश
इस उस के ज़ह्नो दिल की ख़बर और को कहाँ
ख़ुश है कोई फ़रिश्ते से कोई परी से ख़ुश
तेरे करम की हद ही नहीं है मेरे ख़ुदा !
कोई ख़ुदी से ख़ुश है कोई बेख़ुदी से ख़ुश
उसकी ख़ुशी है ख़ूब तो मेरी भी कम नहीं
वो जो अभी से ख़ुश है तो मैं तो कभी से ख़ुश
ये ज़िंदगी भी कैसी अजब ज़िंदगी हुई
कोई किसी से ख़ुश है तो कोई किसी से ख़ुश
'दीक्षित' मुझे मलाल नहीं है अब इसलिए
कोई कहीं तो होगा मेरी शाइरी से ख़ुश
अवनीशकुमार दीक्षित
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