गझ़ल
डूबवा माटे फकत रस्तो हतो
प्रेम ऊर्फे चोतरफ दरियो हतो
हुं घणी वेला तो संधायो अहीं
हुं घणी वेला अहीं तूट्यो हतो
ऐक माणसने दिशाओ चिंधवा
बीजो माणस केवुं आथडतो हतो
हुं समाई ना शक्यो मारी भीतर
खूटता पूर्वे घणुं छलक्यो हतो
आंगणे करवा प्रतीक्षा आपनी
हुं अडाबीड फूल पाथरतो हतो
भरत भट्ट
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