Monday, 30 January 2017

છંદ

.         [ सरस्वती वंदना ]
        रचना - चमन गज्जर

             ( दुहो )
कबुध दल पै कालीका, मात दियण सु मत,
जीह बिराजो जोगणी, नमन मात सरसत्त.

        ( छंद - भुजंग )
नमो शारदा आरदा सुण माता, पुराणं तुंही ज्ञान विज्ञान दाता,
कृपा सागरी मात कल्याणकारी, नमन छे तने शारदा श्रेयकारी.

तुंही अंग पे श्वेत वस्त्रं विटार्यो, मरालं तुंही श्वेत साथे ज धार्यो,
कमल आशनी बीन बाजनहारी, नमन छे तने शारदा श्रेयकारी.

गळे मोगरा माल मुकुट माथे, अने वेद पस्तक धर्यो मात हाथे,
सदा मात देखी अमीं आंख तारी, नमन छे तने शारदा श्रेयकारी.

तुंही चारणां जिह पे मात बीठ्ठी, बही छंद धारा सरीताह मीठ्ठी,
अगम गम कविता उच्चारन वारी, नमन छे तने शारदा श्रेयकारी.

तुंही ज्ञान को मात पंथं दीखाती, अबिद्या बधी जो जपट भाग जाती,
अगिनान दलपे कटारी दुधारी, नमन छे तने शारदा श्रेयकारी.

कमल आशने मा सदा तुं सुहाती, कमल मुखसों गीत कल्यान गाती,
बसो रिद्य कमले कमल नैन वारी, नमन छे तने शारदा श्रेयकारी.

           (  हरीगीत )
समरण करूं थई साबदी उतावळी जट आवजे,
आशन जमावी जीभ पर मा गहन छंदा गावजे,
समजण पडे नई कांई पण मुरजाई गई मारी मती,
हुं बाळ तुं किरपाळ मुं संभाळ ले मा सरसती.

विगियान जानुं न ग्यान जानुं न गान मै मतीमंद हुं,
जानुं न बेद पुरान ना कुछ भान फसीयो फंद हुं,
सब सार तुं अणवार भणतर भणव मुजने भारती,
हुं बाळ तुं किरपाळ मुं संभाळ ले मा सरसती.

              ( सोरठा )
आई मने नो आवडे, व्याकरण तणुं विधान,
गहरूं छंदां ग्यान, (मारी) समजण टूंकी सरसती.

मने न फावे मातरा, गाल गालगा गान,
समजण भेळी सान, सर्मर्ये देती सरसती.

पिंगल पढीयो नथी, जाणुं न डींगल जोग,
(आतो) अठे कठे ना योग, सरजावे मा सरसती.

        ( छप्पय )
मेधा बाला गिरा, नमन प्रिय पसतक पाणी,
कंंठ का'णी विण पाणी, जयो मा वेदांवाणी,
कमल नैनी सुर वैनी ग्यान दैनी मा भाषा,
विद्या शारद प्रभा, विमल जिह्वा धर वासा,
श्वेत वस्त्र श्वेतासनी, श्वेत हंस संगात है,
हिय कमल विराजी 'चमन' कवी, अमणी शारद मात है.

        [ चमन गज्जर ]

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