Wednesday, 8 February 2017

ગઝલ

[2/8, 10:46 AM] Bhatiya: ग़ज़ल

आदम  बन के  जीना ,सीख ले,
इन   आँखों   से पीना, सीख ले।

लोग तो  बहारों  पर  हैं   फ़िदा,
तू पतझड़ से गुज़रना सीख ले।

हँसने  की   अदाकारी  कर  ली,
आँसूओं   से   रोना    सीख  ले।

कुछ  हैं  गिले ,अपने   आप  से,
खुद को  भी ,बदलना सीख  ले।

खुदा  से  भी   कुछ  मत  माँग ,
बादलों  से  बरसना  सीख   ले।

तूने  उगता  हुआ सूरज पूजा है,
शाम  से  कभी ,ढलना सीख ले।

चला जा  तू   खुशबू   समेटकर,
आनंद की तरह,मरना सीख ले।
                   ***
-'कान्त'
[2/8, 10:46 AM] Bhatiya: ग़ज़ल

आदम  बन के  जीना ,सीख ले,
इन   आँखों   से पीना, सीख ले।

लोग तो  बहारों  पर  हैं   फ़िदा,
तू पतझड़ से गुज़रना सीख ले।

हँसने  की   अदाकारी  कर  ली,
आँसूओं   से   रोना    सीख  ले।

कुछ  हैं  गिले ,अपने   आप  से,
खुद को  भी ,बदलना सीख  ले।

खुदा  से  भी   कुछ  मत  माँग ,
बादलों  से  बरसना  सीख   ले।

तूने  उगता  हुआ सूरज पूजा है,
शाम  से  कभी ,ढलना सीख ले।

चला जा  तू   खुशबू   समेटकर,
आनंद की तरह,मरना सीख ले।
                   ***
-'कान्त'

No comments:

Post a Comment