Wednesday, 22 February 2017

ગઝલ

गझ़ल

न शब्दोमां न अर्थोमां न संदर्भोना कारणमां
अमे आवी अने ऊभा अटूला ऐकला क्षणमां

तने प्रगटाववाथी हुं प्रगटतो जाउं छुं अनहद
अरण्योमां ,समंदरमां,पहाडो खीण ने रणमां

हुं तारी आंखथी तारा चरण सुधी छुं पथरायो
अने सर्वत्र विखराई रह्यो छुं ऐम कणकणमां

स्वरुपोमां तो पडघातो रहीश हुं शंखनी माफक
डूबी जावानुं रहेशे जो के  दरिया जेम दर्पणमां

अभणना शिर उपरथी अक्षरो नीचे जरा आव्या
हवे पंडितजी पोथी मुको छो केम प्रांगणमां

               भरत भट्ट

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