Sunday, 26 February 2017

ગઝલ

झूठ का मरतबा आला नहीं देखा जाता
सच के दरबार पे ताला नहीं देखा जाता

हैं सियासत तेरे सब खेल निराले तुझसे।
क्यों गरीबों का निवाला नहीं देखा जाता

जिसने सिखलायी थी हंसने की अदा दुनिया को:
उसके होंटो पे भी नाला नहीं देखा जाता

तेरी आँखों के उजालों में ऐ मेरे हमदम।
अपने किरदार को काला नहीं देखा जाता

हां महोब्बत में कसर रह गयी शायद मुझसे।
क्यों तुझे देखनेवाला नहीं देखा जाता।

कुछ अदीबों ने सुखन को भी कर दिया है मज़ाक।
मुझसे अब कोई रिसाला नहीं देखा जाता
दीद ए मेहबूब की ख्वाहिश में चला पर उनसे।
क्यों मेरे पाँव का छाला नहीं देखा जाता
महबूब सोनालिया

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