Saturday, 18 February 2017

ગઝલ

गझल

हजी ऐ शब्दने प्रगटाववो बाकी ज छे
गझ़लना अर्थने प्रगटाववो बाकी ज छे

पणेथी अहीं सुधी चोमेर अंधारु ज छे
रहो,ऐक दीपने प्रगटाववो बाकी ज छे

घणी वातो करी छे प्रेमना प्रागट्यनी
सलीबे संतने प्रगटाववो बाकी ज छे

नदीओना प्रवाहो आपणे जाण्या नथी
नदीना पंथने  प्रगटाववो  बाकी ज छे

हे,पंडितजी तमे पोथी उपर तमने लखो
कलमना कक्षने  प्रगटाववो बाकी ज छे

मने आहुत किधो छे हजी हमणा ज में
धूणीऐ  धूम्रने  प्रगटाववो  बाकी ज छे

  कहो,क्यांथी करुं प्रारंभ वर्तुलनो हवे
समयना अंतने प्रगटाववो बाकी ज छे

         भरत भट्ट

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