Thursday, 23 February 2017

ગઝલ

गझ़ल

शब्द ताता तेज तिखारे रह्या
पंडितोना अर्थ  अंधारे  रह्या

सांकडी शेरी  समावी ना शकी
ऐ बधां सपनाओ विस्तारे रह्यां

पेटना  खाडाने  पूरी  जे  शके
ऐटलां दाणा क्यां कोठारे रह्यां

कोक दी पामीशुं तारा तेजने
ऐम तारा फक्त  विचारे रह्यां

फूल हलवाफूल थई हसतां रह्यां
कंटको  खिल्या  नहीं भारे रह्यां

खीणमां तरतां रह्यां झूरी -झूरी
आपणा पडघाओ चित्कारे रह्यां

कोक दिवस आभने अडक्या अमे
कोक  दिवस  खीणनी  धारे  रह्यां

तर्क तूटतावेंत ऐ तूटी पड्या
गामलोको केवा गुब्बारे रह्यां

मन गयुं  त्यां  मननी  मुरादो  गई
पग रह्यां तो पलनी पगथारे रह्या

कोई मनने ऐम कोतरतुं रह्युं
शिल्प जेवा कोई विचारे रह्यां

भीडमां न्होतां छतां भूला पड्यां
ऐकला   अणबूझ   ईशारे   रह्यां

          भरत भट्ट

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