अपनी हालत पे हंसी आने लगी,
आइने से आंख शरमाने लगी;
वक्त ने छेडा अचानक से यूं ही,
जिन्दगी भी गीत वो गाने लगी;
बदनसीबी छिन कर डिब्बा मेरा,
मेरे हिस्से की खुशी खाने लगी!
छुट्टीयाँ कुछ दिन गुजारी मेरे घर,
लो, खुशहाली लौट कर जाने लगी;
इस कदर तन्हाइ ने चाहा मुजे,
मौत भी आने से कतराने लगी;
कल मेरे सपने में माँ खुद आ गइ!
उंगलियों से बाल सहलाने लगी;
फिर से उस दामन से मैं लिपटा रहा;
अब मेरी तकदीर इतराने लगी!
वख्त बेवख्त बुरा मानने की आदत है,
सब के बारे में उसे जानने की आदत है;
अपने रिश्ते को तुम दुनिया से बचा कर रक्खो!
दरारें भर दो, इसे झांकने की आदत है;
दिन तो थक-हार के सो लेता है कहीं जा के,
रात को रात भर यूँ जागने की आदत है!
उदासी फिर से आंसुओं को बुला ही लेगी!
इस को तन्हाइयों से भागने की आदत है;
दर्द को गोद में सहला के सुला दो थोडा;
ऐसा लगता है इसे पालने की आदत है;
क्यूँ खफा हो के तूं हर वख्त तोड़ देता है?
सच बताना तो भला आईने की आदत है;
हम से पूछो ना किस ने छीन ली बाज़ी हम से;
छोडो, जाने दो, हमें हारने की आदत है!
: हिमल पंड्या
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