Saturday, 29 April 2017

ગઝલ

पुछा नहीं है उसने कभी हाले जार तक,
हालात  आ  गये  हैं  जहां इन्तशार तक।

उनकी नजर का बदला हुवा रुख तो देखलो,
सुखा पडा हुवा हे जहां  आबशार तक।

मंजिल की आस लेके चलेथे सफर को हम,
दो गाम कर नहीं पाये तय रहेगुजार तक।

आइ हैं उठके इस तरफ ये देखो आंधीयां,
कर जाये ना जो हमारा सबकुछ ख्वार तक।

राहे वफा में हमने गंवादी अपनी कायनात,
पुरसीश को भी रहा न कोइ  गमगुसार तक।

करते  रहे गुरेज  गुनाहों से  फीरभी हम,
हम उनके रुबरु हुवे हैं हो शरम सार तक।

अपने नसीब का ये मासूम क्या मिला हमें,
हम जी रहे है बनके  यहां  सोगवार तक।

                   मासूम मोडासवी

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