मेरे रश्के-कमर , तूने पहली नजर,
जब नजर से मिलायी मज़ा आ गया ।
बर्क़ सी गिर गयी , काम ही कर गयी,
आग ऐसी लगायी मज़ा आ गया ।
जाम में घोलकर हुस्न कि मस्तियाँ,
चांदनी मुस्कुरायी मज़ा आ गया ।
चाँद के साये में ऐ मेरे साक़िया,
तूने ऐसी पिलायी मज़ा आ गया ।
नशा शीशे में अगड़ाई लेने लगा,
बज्मे-रिंदा में सागर खनकने लगा।
मैकदे पे बरसने लगी मस्तिया,
जब घटा गिर के छायी मज़ा आ गया।
बे-हिज़ाबाना वो सामने आ गए,
और जवानी जवानी से टकरा गयी।
आँख उनकी लड़ी यूँ मेरी आँख से ,
देखकर ये लड़ाई मज़ा आ गया।
आँख में थी हया हर मुलाकात पर ,
सुर्ख आरिज़ हुए वस्ल की बात पर।
उसने शरमा के मेरे सवालात पे,
ऐसे गर्दन झुकाई मज़ा आ गया।
शैख़ साहिब का ईमान बिक ही गया,
देखकर हुस्न-ऐ-साक़ी पिघल ही गया।
आज से पहले ये कितने मगरूर थे,
लूट गयी पारसाई मज़ा आ गया।
ऐ “फ़ना” शुक्र है आज वादे फ़ना,
उस ने रख ली मेरे प्यार की आबरू।
अपने हाथों से उसने मेरी कब्र पर,
चादर-ऐ-गुल ल चढ़ाई मज़ा आ गया।
📝🔹शायर🔸हसरत मोहानी🔸🔹
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