Monday, 17 April 2017

ગઝલ

मेरे रश्के-कमर , तूने पहली नजर,
जब नजर से मिलायी मज़ा आ गया ।

बर्क़ सी गिर गयी , काम ही कर गयी,
आग ऐसी लगायी मज़ा आ गया ।

जाम में घोलकर हुस्न कि मस्तियाँ,
चांदनी मुस्कुरायी मज़ा आ गया ।

चाँद के साये में ऐ मेरे साक़िया,
तूने ऐसी पिलायी मज़ा आ गया ।

नशा शीशे में अगड़ाई लेने लगा,
बज्मे-रिंदा में सागर खनकने लगा।

मैकदे पे बरसने लगी मस्तिया,
जब घटा गिर के छायी मज़ा आ गया।

बे-हिज़ाबाना  वो सामने आ गए,
और जवानी जवानी से टकरा गयी।

आँख उनकी लड़ी यूँ मेरी आँख से ,
देखकर ये लड़ाई मज़ा आ गया।

आँख में थी हया हर मुलाकात पर ,
सुर्ख आरिज़ हुए वस्ल की बात पर।

उसने शरमा के मेरे सवालात पे,
ऐसे गर्दन झुकाई मज़ा आ गया।

शैख़ साहिब का ईमान बिक ही गया,
देखकर हुस्न-ऐ-साक़ी पिघल ही गया।

आज से पहले ये कितने मगरूर थे,
लूट गयी पारसाई मज़ा आ गया।

ऐ “फ़ना” शुक्र है आज वादे फ़ना,
उस ने रख ली मेरे प्यार की आबरू।

अपने हाथों से उसने मेरी कब्र पर,
चादर-ऐ-गुल ल चढ़ाई मज़ा आ गया।

📝🔹शायर🔸हसरत मोहानी🔸🔹

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