नहीं
स्मरणोने झीलवा हुं हथेली धरुं नहीं
आकाश जेवुं साव भूरुं विस्तरुं नहीं
आंखो सपाट दृश्यने जोया करे भले
चित्तमां रहेल चित्र हवे चितरुं नहीं
खालीपो ऐटले हुं विखेरी दउं मने
खाली थयेल जीव जरा पण भरुं नहीं
क्यारेक नेवां धारे ने क्यारेक टीपे टीपे
टपकी पडुं सतत ने कदी झरमरुं नहीं
मारामां खोदकाम सतत चालतुं रहे
ने ऐवुं थाय नीकले ऐक्के य चरुं नहीं
भरत भट्ट
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