Tuesday, 25 April 2017

ગઝલ

ग़ज़ल

एक  हसीन  ख्याल ,दिल को भाया था,
मैंने  हर  लमहे  का  लुत्फ़  उठाया था।

आश्रय  दे दिया  उसे, अपनी  बज़म में,
जो   मेरी   ज़िंदगी  माँगने   आया  था।

अज़नबी  से लगते  हैं  यहाँ  अपने  भी,
कैसे  कह  दूँ  कि  वो  कोई  पराया  था ?

आज  तलखिये - अईयाम  पिला रहा है,
वही  शख़्स  कल  तक , मेरा  साया था।

कभी  झुक  न पाया , वक़्त  के  सामने,
कई  बार  असीरों  ने भी  आज़माया था।

'अजित 'कई अपने-पराये  लगने  लगे,
बड़े  प्यार  से  जिन्हें  गले लगाया  था।
                       ***
-अजित मानसत्ता  'अजित '

*बज़म -મહેફિલ  *तलखिये -अ ईयाम -
દુનિયાની કડવાશ * असीरों-આકાશ
*इज़हार -પ્રકટીકરણ

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