दिल में हमारे आपसा अपना बना रहा,
आंखें जगी रही नया सपना बना रहा ।
अपनी हयात में कोइ हमसफर तो हो,
तुम मिल गये तो वस्ल का जज्बा बना रहा ।
वैसे धडकते दिल में कइ हसरतें रहीं,
तेरे विसाल से मेरा बसना बना रहा।
चलती रहीं ये जिंदगी तनहा जहान में,
उनके करम से जीनेका इमकां बना रहा।
आवाज तेरी गुंजती रस घोलती रही,
महेफील सजाता ऐक ये नग्मा बना रहा।
जीते रहे हैं गम से हम मासूम जुडे हुवे,
खुशीयों का फीरभी ऐक सरापा बना रहा।
मासूम मोडासवी
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