Wednesday, 3 May 2017

ગઝલ

झूठ कैसे हलक से उतरे निवाले की तरह
मेरी गैरत चीखती है मुह के छाले की तरह

प्यास की शिद्दत से मुह खोले परिंदा गिर पड़ा
सीढियों पर हाफ्ते अखबार वाले की तरह

ऐसे मौसम में बरहना फिर रहा हू मै कि जब
ओढ़ लेता है शज़र पत्ते दुशाले की तरह

एक कैदी की तरह मेरी अना बेबस रही
ख्वाहिशे घेरे रही मकड़ी के जाले की तरह

इक सुलगते शहर में बच्चा मिला हँसता हुआ
सहमे सहमे से चरागों के उजाले की तरह

🖌🔹शायर🔸मुनव्वर राना🔹🔸

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