Tuesday, 2 May 2017

ગઝલ

नइ  सोच  लेकर जमाने  चले
फने  राजे  हस्ती  बताने  चले

बढी इख्तलाफात की ये रंजीशें
तअस्सुब  को आगे बढ़ाने चले

दिलों मेअदावत का जज्बा लीये
गलेसे  हम  सभीको लगाने चले

रही  जीनकी फीतरत में बरहमी
वो  बातें  अमन की  चलाने चले

हकिकत को जुठलाने  की चालमें
आलम को  हम  क्या दीखाने चले

नया दौर  आया है कैसा ये मासूम
हम  लुटी अस्मतो को बचाने चले।

                मासूम मोडासवी

No comments:

Post a Comment