गीत
वर्षा की बूँदों में जीवन बरसे,
मेरे मन में यादों का सावन सरसे।
फ़ूट गया उनका इक़बाल बेचारा,
जिन्होंने इन बादलों को न पुकारा।
उनका जीना भी क्या जीना यारो,
जिनके प्राणों में गीत न छलके।
देख रहा हूँ गलियों में मैं पानी,
गोरी के संग कर रहा है मनमानी।
तन-मन-धन , सब अर्पण है मेरा,
साथ न तुम तो ,मैं बहूँगा गलके।
झरोखे इन बादल के मैं पा लूँगा,
आसमान को दो कदमों में नापूँगा।
स्वरों का न संगम, बाँसुरी अधूरी,
भीग गईं हैं मेरी आँखों की पलकें।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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