नक्श लायलपूरी साब की ग़ज़ल
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हम तेरी ज़ुल्फ़ के साये को घटा कहते हैं
इतने प्यासे है कि क्या कहना था क्या कहते हैं
तुझ को दुनिया ने मसीहा भी कहा कातिल भी
हम से भी पूछ कभी हम तुझे क्या कहते हैं
बन के मस्ती जो छलकता है तेरी आँखों से
हम उसे सारी शराबों का नशा कहते हैं
जिस में अंदाजे-वफ़ा हो न मुहब्बत न खुलूस
ऐसे जीने को तो हम एक सजा कहते हैं
'नक्श' किस किस की जबाँ बंद करोगे, छोड़ो
लोग अच्छों को भी दुनिया में बुरा कहते हैं
.. नक्श लायलपूरी
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