Sunday, 13 August 2017

ગઝલ

आसमां पर ज़मीन लिखते हैं
    लोग कितना महीन लिखते हैं

सब पुराना सा लगने लगता है
    जब भी ताज़ा तरीन लिखते है

आज देखा उसे तो ये जाना
    सब उसे क्यों हसीन लिखते हैं

कितने मजबूर हो गए हैं हम
    अहमकों को ज़हीन लिखते हैं

आईये आज दौर ए हाज़िर में
    आदमी को मशीन लिखते हैं

ये भी उर्दू की देन है बेटे
    जो तुझे जाँ नशीन लिखते हैं

उसका लहजा कमाल है 'साजिद'
    इसलिये आफ़रीन लिखते हैं

                        - साजिद सफ़दर

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