आसमां पर ज़मीन लिखते हैं
लोग कितना महीन लिखते हैं
सब पुराना सा लगने लगता है
जब भी ताज़ा तरीन लिखते है
आज देखा उसे तो ये जाना
सब उसे क्यों हसीन लिखते हैं
कितने मजबूर हो गए हैं हम
अहमकों को ज़हीन लिखते हैं
आईये आज दौर ए हाज़िर में
आदमी को मशीन लिखते हैं
ये भी उर्दू की देन है बेटे
जो तुझे जाँ नशीन लिखते हैं
उसका लहजा कमाल है 'साजिद'
इसलिये आफ़रीन लिखते हैं
- साजिद सफ़दर
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