Wednesday, 27 September 2017

ગઝલ

हंसता हुवा चहेरा तेरा खीलते गुलाब सा
हटता नहीं आंखों से ये मंजर शबाब सा

अब कैसे निगाहों को बचाऐं कहो हुजुर,
छाया है नशा बनके जो सरपे शराब सा।

युंतो जहां में हैं कइ चहेरे हसीन तर,
मीलता  नहीं है हमको ये रुत्बा जनाब सा।

अब क्या बताऐं कैसे तनहा कटे हयात,
रोके है आगे बढ़ने से हमें जल्वा ख्वाब सा।

मासूम हो गया बड़ा तकदीर का करम,
जीसके बगेर  अब लगे जीना अजाब सा।

                               मासूम

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