ग़ज़ल
इस कदर क्यों सताते हो ?
क़िल्लत ही क्यों बताते हो ?
मुस्कुराना तुम्हीं से सीखा हमने,
फिटकार कर क्यों रुलाते हो ?
क़िस्तबंधी क़ुबूल कर ली हमने,
ख़ुदा कसम क्यों दिलाते हो ?
पतझड़ से इश्क़ है हमें जानम ,
फस्ले -गुल को क्यों बुलाते हो ?
फ़ाहिश नहीं है हमारी कलम,
फिर इतना शोर क्यों मचाते हो ?
माना कि रंजिशें हैं हमारे दर्मियाँ ,
लड़ने लश्कर क्यों बुलाते हो ?
लहालोट हैं हम तुमसे मिलकर,
ख़ामोशी पर क्यों चिल्लाते हो ?
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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