Monday, 23 October 2017

ગઝલ

कैसा उनका हुवा सामना क्या करें,
दो कदम का रहा फासला क्या करें।

जिंदगी  के नये  ख्वाब  बुनते  रहे ,
जैसा  चाहा वोही ना बना क्या करें।

वो करीब आये ओर बात हो ना सकी,
कुछ  अधुरा  रहा  चाहना क्या करे ।

जीनकी खातीर उठाये हजारो सीतम,
वोही  रुठा  मेरा  आशना  क्या करें।

बज्म  की ये बे  खुदी खींच लाइ यहां ,
होश  में  ही  नथा भागना क्या करें ,

चाह घटती रही आश रही बढती रही,
खुदको मासूम पडा थामना क्या करें ।

                    मासूम मोडासवी

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